श्री चण्डी-ध्वज स्तोत्रम् (Shri Chandi Dhwaj Stotram Lyrics in Hindi) - Bhaktilok

Roshan Lal Bind

 श्री चण्डी-ध्वज स्तोत्रम् (Shri Chandi Dhwaj Stotram Lyrics in Hindi) - 


॥ विनियोग ॥

अस्य श्री चण्डी-ध्वज स्तोत्र मन्त्रस्य मार्कण्डेय ऋषिः, 

अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रां बीजं, 

श्रीं शक्तिः, श्रूं कीलकं मम वाञ्छितार्थ फल सिद्धयर्थे विनियोगः.


॥ अंगन्यास ॥

श्रां, श्रीं, श्रूं, श्रैं, श्रौं, श्रः ।


॥ मूल पाठ ॥

ॐ श्रीं नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै भूत्त्यै नमो नमः ।

परमानन्दरुपिण्यै नित्यायै सततं नमः॥१॥


नमस्तेऽस्तु महादेवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा॥२॥


रक्ष मां शरण्ये देवि धन-धान्य-प्रदायिनि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा॥३॥


नमस्तेऽस्तु महाकाली पर-ब्रह्म-स्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा॥४॥


नमस्तेऽस्तु महालक्ष्मी परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा॥५॥


नमस्तेऽस्तु महासरस्वती परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा॥६॥


नमस्तेऽस्तु ब्राह्मी परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥७॥


नमस्तेऽस्तु माहेश्वरी देवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥८॥


नमस्तेऽस्तु च कौमारी परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥९॥


नमस्ते वैष्णवी देवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१०॥


नमस्तेऽस्तु च वाराही परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥११॥


नारसिंही नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१२॥


नमो नमस्ते इन्द्राणी परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१३॥


नमो नमस्ते चामुण्डे परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१४॥


नमो नमस्ते नन्दायै परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१५॥


रक्तदन्ते नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१६॥


नमस्तेऽस्तु महादुर्गे परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१७॥


शाकम्भरी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१८॥


शिवदूति नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१९॥


नमस्ते भ्रामरी देवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२०॥


नमो नवग्रहरुपे परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२१॥


नवकूट महादेवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२२॥


स्वर्णपूर्णे नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२३॥


श्रीसुन्दरी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२४॥


नमो भगवती देवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२५॥


दिव्ययोगिनी नमस्ते परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२६॥


नमस्तेऽस्तु महादेवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२७॥


नमो नमस्ते सावित्री परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२८॥


जयलक्ष्मी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२९॥


मोक्षलक्ष्मी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।

राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥३०॥


चण्डीध्वजमिदं स्तोत्रं सर्वकामफलप्रदम् ।

राजते सर्वजन्तूनां वशीकरण साधनम् ॥३१॥


सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते॥


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